फलानी की सास का स्वभाव तो बड़ा खराब हैं", "शर्मा जी तो झूठी शान दिखाते हैं "वर्मा जी की बहु उनके साथ बहुत दुर्व्यवहार करती हैं, "गुप्ता जी ने इतना बड़ा घर तो लोन लेकर बनाया हैं" शुक्ला-शुक्लाइन की आपस में ज़रा भी नहीं बनती", खन्ना जी की नौकरानी बड़ी चंट है उन्हें सारे मोहल्ले भर की खबरे देती हैं, "मिश्रा जी की बहु उन्हें खाना नहीं देती है", " यादव जी का लड़का दिनभर मारा-मारा फिरता है", "उस्मान साहब का दमाद उनकी जायदाद पर नजर गड़ाये है"। ऐसी अनेक बातें हम रोजमर्रा के जीवन में सुनते रहते हैं, इससे पता चलता हैं कि समाज में एक वर्ग ऐसा भी होता हैं जिसे सिर्फ दूसरों पर नजर रखना और उनसे सम्बंधित बे सिर पैर कि कहानिया चटखारें लेकर सुनना और सुनाना अच्छा लगता हैं। हालांकि इस कार्य में महिलाओ की संलिप्ता अधिक होती है लेकिन पुरुष भी कुछ खास पीछे नहीं रहतें। समाज में रहने वाले ये कुछ लोग जाने अनजाने किसी भी घर में आग लगा सकने में सक्षम होते हैं। इससे इन्हें क्या मिलता है ये तो यह ही बता सकते हैं। लेकिन मेरे मन में बार-बार ये ख्याल आता हैं कि जब सड़क पर या आपके पड़ोस में एक पति अपनी पत्नी को बेरहमी से पीट रहा होता है तब इसे आपसी मामला क्यों समझा जाता हैं, जब चलती सड़क पर जवान लड़कियों पर फब्तियां कसी जाती हैं, तब इसे नजरंदाज क्यों कर दिया जाता हैं, जब दहेज के लिए एक बहु जला दी जाती हैं तब तक उसकी स्थिति का पता बाहर वालों को क्यों नहीं लगता, जब कोई बेटा अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम में भेज देता हैं तब आस पास के लोग कहाँ जाते हैं, जब किसी के लड़के कि नौकरी छूट जाती हैं तब उसकी सहायता को लोग आगे क्यों नहीं आते, कई बार लगता हैं कि लोगों में जागरूकता का अभाव हैं। कई बार उन्हें सिर्फ निंदा रस अति प्रिय लगता हैं। वास्तव में इस पर शोध होना चाहिए कि इंसान अपना गिरेबां छोड़ हमेशा दूसरों के घर में ताकाझांकी क्यूं करना चाहता है। अपनी बुराईयां उसे क्यूं नहीं दिखाई देती हैं, गर दिखाई देती है तो उन्हें नजरअंदाज कर उसे दूसरों के दामन दाग ढूढ़ने से क्या हासिल हो जाता है।
नोट: ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं कृपया अन्यथा न लें, गर लें तो पूर्णतयाः लें।

आपके यहाँ आकर अच्छा लगा।
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