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Monday, September 5, 2011

मेरी सम्पत्ति घोषणा, अब कोई डाऊट मत रखना


 देश में भ्रष्टाचार के प्रति पनपते आक्रोश को देखते हुए मैं काफी सहम सा गया हूं। दिनभर लोगों को भ्रष्ट बोलते-बोलते अब मुझे डर सा लगने लगा है। न जाने क्यूं अब रोज रात सपने में स्वप्नसुदंरी की जगह घर के बाहर दरवाजे पर टंगी पत्रपेटी आती है। लगता है कि केजरीवाल और किरन बेदी के बाद अब मुझे भी कोई नोटिस मिलने वाली है। जिस तरह से सभी माननीय पारदर्शिता दर्शाने के लिए अपनी-अपनी सम्पतियां घोषित कर खुद को लकीर का फकीर साबित कर रहे हैं, जजों को महाभियोग काल से गुजरना पड़ रहा है। उससे प्रतीत होता है कि अब सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ ज्यादा बक-बक करने वालों के पोस्टमार्टम की तैयारी कर रही है। मेरी भलाई इसी में है कि मैं समय रहते अपनी सम्पत्ति की घोषणा कर दूं। अपना दिल थाम लें, बेहतर होगा। सम्पत्ति के नाम पर मेरे पास "दस बाई दस" के दो कमरों की आलीशान (जर्जर आपके लिए होगी) कोठी है जोकि प्राकृतिक साजो-सामान से लैस है। बारिश के मौसम में नहाने के लिए बाथरूम तक जाने की जहमत नहीं उठानी पड़ती कमरे में ही स्नानादि किया जा सकता है। छत पर पड़ी दरारें फौव्वारे का काम करती हैं। वाहन के नाम पर मेरे पास एक "मंगल पाण्डेय" टाइप साइकिल है। जिसमें ब्रेक का बवाल ही नहीं है। जिसे देखकर दूध वाला भी मुझे कभी-कभी उसे म्यूजियम में रखने की सलाह दे डालता है। जिस बाइक में मैं कभी-कभी दिख जाता हूं असल में वो बगल वाले शर्मा जी की है जिसका उपयोग मैं उनकी गैरमौजूदगी में उनके सुपुत्र को चुटकुले सुनाकर कर लेता हूं। उसका मन बहल जाता है और मेरा भौकाल टाइट हो जाता है। हीरे जवाहरात के नाम पर मेरे पास पुरी से दो-दो रुपये में लाए हुए पचास मोती हैं जिन्हें मैंने सुरक्षा के लिहाज से घर के पिछवाडे़ जमीन खोदकर छिपा रखा है। सुना है सोना 28 हजारी हो चला है लेकिन उस सोने से मेरा दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। सोने के नाम पर मैं सिर्फ बिस्तर पर ही सोना जानता हूं। कैश के नाम पर सुबह दूध और सब्जी लाने के बाद मेरे पास 229 रुपये बचे हैं और अभी महीना खत्म होने में 20 दिन बाकी हैं। जेब में "एटीएम टाइप" के तीन-तीन यंत्र हैं। दो पड़े पाए थे एक बैंक ने दिया था, लेकिन उनका इस्तेमाल खतरे से खाली नहीं है। कारण बैंक में एकाउण्ट मिनिमम बैलेंस 1000 रुपये से खुलवाया था और उसे सात सालों बाद भी वैसे ही मेनटेन कर रखा है। बैंक वाले कई बारगी मेरी तलाश में घर आ चुके हैं। मां से कहकर गए हैं हमने बैंक खोला रखा है कोई सेक्योरिटी एंजेसी नहीं। मेरे पास दफ्तर की तरफ से दिया हुआ एक टूटा पुराना "मोबाइल" भी है जिसमें सिर्फ इनकमिंग की सुविधा है, आउटगोंइग पिछले कई सालों से बंद है। रिचार्ज के पैसे बचाकर मैं दिन में दो बार चाय जो पी लेता हूं। पिता जी की दी हुई एक एचएमटी ब्राण्ड की "कलाई घड़ी" भी है जो दिनभर में तीन बार चाभी भरने पर आधा घंटा पीछे का टाइम बताती है। किन्तु मैं हालातों के साथ समझौता कर उससे सही समय समझ लेता हूं। कपड़ों के नाम पर मेरे पास नुक्कड़ वाले खान चचा द्वारा डिजाइन किए हुए तीन जोड़ी पैन्ट और शर्ट हैं। उसके आलावा जो पहने दिख जाता हूं वह सब दोस्तों और रिश्तेदारों का प्यार है। या यूं कह लें कि वो मुझे रोज-रोज एक ही पैन्ट में देखकर बोर हो जाए है तो वह मुझे अपने रंगीन कपड़े एकाध रोज के लिए उधार दे देते हैं। जिन्हें पहनकर मैं अक्सर रौब गांठता दिख जाता हूं। मेरे पास एक अकबर के जमाने का पोर्टेबुल साइज का "रंगीन टीवी" भी है जिसके रंगीन होने का रहस्य आजतक मेरे और उसके अलावा कोई नहीं जान सका। उसकी हालत ऐसी है कि उसके साथ मेरी फोटो अगर अखबार में छप जाए तो तुसाद म्यूजियम वाले अपने म्यूजियम में मेरा मोम का पुतला लगाने के खातिर मुझे ढूंढ़ने के लिए मेरे पीछे खुफिया एंजेसियां लगा देंगे। एक फ्रिज भी है जिसके बारे में मां को कई बार कहते हुए सुना है कि मेरे जन्म के लगभग एक साल पहले तक उसमें बर्फ जमा करती थी। इस समय उसका इस्तेमाल मैं अपने जूते-मोजे सहित कई घरेलू सामानों को रखने में करता हूं। फिलहाल इतना ही काफी है। बाकी मैं चिदम्बरम्, मुखर्जी, सिब्बल और दिग्विजय सिंह की तरह चिंदी नहीं हूं जो मग्घे, बाल्टी और लोटे तक की घोषणा करता फिरूं।


(झोलाछाप लेखक )
चिन्टू

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