हमारी दादियां नानियां न जाने कितनी बार मारीं जाती हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता। बहुत सारी दादियां मरने से पहले गंभीर रूप से बीमार पड़ती हैं। कुछ दादियों को अचानक चेकअप के लिए ले जाना पड़ता है। स्कूल, कालेज और दफ्तर में बहानेबाज़ी के अचूक हथियार के रूप में दादी का मरना, बीमार पड़ना आम हो गया है। और कारगर भी। पहले भी इस बहाने का इस्तेमाल होता था और आज कल भी हो रहा है। वो लोग भी इस बहाने का इस्तेमाल करते हैं जिनकी दादी कब की मर चुकी होती हैं या जिन्होंने दुनिया में आने के बाद से ही अपनी दादी को कभी देखा ही नहीं ।
मेरे दोस्तों को इस तरह का अनुभव हो रहा है। वो कानपुर एचबीटीआई में पढ़ाते हैं। एक छात्रा ने अपनी दादी को इसलिए मार दिया क्योंकि वो समय पर अपना असाइन्मेंट नहीं कर सकी थी। शायद यह छात्रा स्कूल के दिनों से दादी को बीमार बताते-बताते बोर हो गई होगी। कालेज में आकर इससे अब दादी की बीमारी देखी नहीं जा रही होगी तभी उसने उन्हें मारने का कठोर फैसला लिया होगा। उसी छात्रा ने किसी और टीचर के सामने कुछ दिन पहले अपनी नानी को मृत घोषित कर दिया। स्कूल के दिनों में भी कई लोग इस तरह के बहाने करते थे। मैंने भी किए हैं। इस पर एक राष्ट्रव्यापी शोध होना चाहिए कि भारतीय छात्र छात्राएं छुट्टी लेने या काम न पूरा करने के लिए क्या क्या कारण देते हैं । मातहत अपने अफसर से छुट्टी पाने के लिए क्या-क्या बहाने करते हैं।
पता नहीं कितने बच्चों के साथ दादी रहती होगी। ये बच्चे अपनी दादी को मारने में संकोच नहीं करते। शायद इससे पता चलता है कि हमारे घरों में दादियों की बाकी बची ज़िंदगी की हालत क्या है। शायद घरों में दादियों की हालत मरी हुई जैसी ही है। उनके साथ ऐसा ही व्यावहार होता होगा या फिर अब मरी कि तब मरी के रुप में मरने का इंतज़ार होता होगा। कोई भावनात्मक संबंध तो कम से कम नहीं होगा । कई घरों में दादियां रहती ही न होंगी। जहां रहती होंगी वहां मौत के करीब या मरने वाली दादी ही मानी जाती होगी। तभी एक छोटे से काम के लिए बच्चे स्वाभाविक रुप से अपनी दादी को मार देते हैं। जबकि घरों में जाइये तो बच्चे के लिए दादी का दिल बहुत पिघलता है। काश दादी को पता होता कि ये बच्चा जिसे वो पुचकारना चाहती है वही आज उन्हें अपने प्रोफेसर के सामने मृत घोषित कर आ रहा है। हंसती बोलती सफेद धवल हमारी दादियां। जिनके साये में हम बड़े होते हैं। पलते रहते हैं। महफूज़ रहते हैं। वो हमें ज़रा सी चोट लगने पर घर आसमान पर उठा लेती हैं। हम उन्हें मारते रहते हैं।
जो भी इस लेख को पढ़ रहा है क्या वह स्वीकार करने का हौसला दिखाएगा कि उसने भी किसी प्रसंग में दादी या किसी रिश्तेदार के बीमार होने से लेकर मर जाने तक का बहाना किया है। यह एक गंभीर सामाजिक शोध का विषय हो सकता है। इससे पता चलेगा कि झूठ बोलने के इन मौकों में हम किन किन लोगों का इस्तेमाल करते हैं। कुछ लोगों ने बताया कि मां बीमार है कहने में कलेजा कांप जाता है। पापा को बीमार कह नहीं सकते। दादी ही है जिसे बीमार से लेकर मारा भी जा सकता है। मैं उन तमाम दादियों की आत्मा की शांति के प्रार्थना करता हूं जिनके पोते पोतियां उन्हें मार देते हैं। झूठ की सामाजिकता इन्हीं सब बहानों से बनती जाती है। ईश्वर सभी दादियों को बहुत लंबी उम्र दे ताकि उनके पोते पोतियों को मारने का यह बहाना कई सालों तक काम आता रहे। बल्कि दादियों के लिए एक आइडिया है। वो पता करती रहें कि पोती ने होमवर्क किया है या नहीं या फिर स्कूल गई है या नहीं। जब भी उन्हें लगे कि ऐसा हुआ है तो वो झट से स्कूल फोन कर दें औऱ बता दें कि मैं मरी नहीं हूं। बीमार भी नहीं हूं। ज़िंदा हूं.....ज़िंदा हूं.......ज़िंदा हूं.......ज़िंदा हूं........ज़िंदा हूं
(झोलाछाप लेखक चिन्टू)

मुझे कभी ये मौका ही नहीं मिला?
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