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Sunday, September 18, 2011

ऊ चले बर्तन यादव के घर मा


फलानी की सास का स्वभाव तो बड़ा खराब हैं", "शर्मा जी तो झूठी शान दिखाते हैं "वर्मा जी की बहु उनके साथ बहुत दुर्व्यवहार करती हैं, "गुप्ता जी ने इतना बड़ा घर तो लोन लेकर बनाया हैं" शुक्ला-शुक्लाइन की आपस में ज़रा भी नहीं बनती", खन्ना जी की नौकरानी बड़ी चंट है उन्हें सारे मोहल्ले भर की खबरे देती हैं, "मिश्रा जी की बहु उन्हें खाना नहीं देती है", " यादव जी का लड़का दिनभर मारा-मारा फिरता है", "उस्मान साहब का दमाद उनकी जायदाद पर नजर गड़ाये है"। ऐसी अनेक बातें हम रोजमर्रा के जीवन में सुनते रहते हैं,  इससे पता चलता हैं कि समाज में एक वर्ग ऐसा भी होता हैं जिसे सिर्फ दूसरों पर नजर रखना और उनसे सम्बंधित बे सिर पैर कि कहानिया चटखारें लेकर सुनना और सुनाना अच्छा लगता हैं।  हालांकि इस कार्य में महिलाओ की संलिप्ता अधिक होती है लेकिन पुरुष भी कुछ खास पीछे नहीं रहतें। समाज में रहने वाले ये कुछ लोग जाने अनजाने किसी भी घर में आग लगा सकने में सक्षम होते हैं। इससे इन्हें क्या मिलता है ये तो यह ही बता सकते हैं। लेकिन मेरे मन में बार-बार ये ख्याल आता हैं कि जब सड़क पर या आपके पड़ोस में एक पति अपनी पत्नी को बेरहमी से पीट रहा होता है तब इसे आपसी मामला क्यों समझा जाता हैं, जब चलती सड़क पर जवान लड़कियों पर फब्तियां कसी जाती हैं, तब इसे नजरंदाज क्यों कर दिया जाता हैं,  जब दहेज के लिए एक बहु जला दी जाती हैं तब तक उसकी स्थिति का पता बाहर वालों को क्यों नहीं लगता, जब कोई बेटा अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम में भेज देता हैं तब आस पास के लोग कहाँ जाते हैं,  जब किसी के लड़के कि नौकरी छूट जाती हैं तब उसकी सहायता को लोग आगे क्यों नहीं आते,  कई बार लगता हैं कि लोगों में जागरूकता का अभाव हैं। कई बार उन्हें सिर्फ निंदा रस अति प्रिय लगता हैं। वास्तव में इस पर शोध होना चाहिए कि इंसान अपना गिरेबां छोड़ हमेशा दूसरों के घर में ताकाझांकी क्यूं करना चाहता है। अपनी बुराईयां उसे क्यूं नहीं दिखाई देती हैं, गर दिखाई देती है तो उन्हें नजरअंदाज कर उसे दूसरों के दामन दाग ढूढ़ने से क्या हासिल हो जाता है।

नोट: ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं कृपया अन्यथा न लें, गर लें तो पूर्णतयाः  लें।

Thursday, September 15, 2011

हिन्दी बिन बिन्दी चिन्दी-चिन्दी



आज ‘हिन्दी डे’  था । हां बाबू वही ‘हिन्दी डे’ जब हम अचानक साल भर अग्रेंजी के स्विमिंग पूल में तैरने के बाद हिन्दी की पोखरी में गोता लगाने उतरते हैं फिर हिन्दी को अपनी राष्ट्र भाषा बता इसकी दुर्दशा पर आंसू भी बहाते हैं, इसके उत्थान के लिए कसमें खाते हैं, मगर ‘हिन्दी डे’ ही मनाते हैं (वो क्या है न हिन्दी दिवस कहने में शर्म आती है)। हिन्दी विभागों में तो इस दिन को पर्व के रूप में मनाया जाता है (मतलब दिखावे की सारी पराकाष्ठा पार)। ये अलग बात है कि रागदरबारी के रचियता श्रीलाल शुक्ल जी ने इसे हिन्दी दिवस न मानकर एक प्रकार का पाखण्ड पर्व कहा जिससे मैं एक हद तक सहमत भी हूँ। मैं ही क्या बहुतों की सहमति होगी। मुझे तो अब इस बात का डर सताने लगा है कि कहीं भविष्य में हिन्दी के अस्तित्व के लिए हिन्दी महीना न मनाना पड़े। जो लोग हिन्दी के नाम पर संस्कृति या भाषा प्रचारक बनते हैं उनकी जरूर ऐसे समय में निकल पड़ती है (फण्ड आदि की थोड़ी सुविधा जो मिल जाती है)। आज कष्ट इस बात का हुआ कि मेरे सभी यार, दोस्त और दफ्तर में साथ काम करने वाले सभी सहकर्मी जो मामूली से मामूली ‘डे’ की शुभकामनाएं देते नहीं थकते थे। फालतू टाइप के मैसेज भेजकर पूरे इन्बाक्स पर अपना अधिपत्य जमा लेते थे (मानो मोबाइल मैं उन्हीं के बेकार मैसेजों को अपने पास सुरक्षित रखने के लिए लिया हो)। हिन्दी दिवस पर उन्हीं  सूरमाओं से अपनी राष्ट्रभाषा (हिन्दी) के सम्मान  के लिए उनके मोबाइल बैलेस से 10 पैसे नहीं खर्च किए जा सके (जियो जवानों जम्हूरियत तुम्हारे बल पर ही जिंदा है)।
      खैर यह भी देखा गया है कि जिस किसी के नाम पर उसका ‘डे’ मनाया जाता है उसी दिन उसकी ज्यादा से ज्यादा अवमानना भी होती है। पंद्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी के दिन पूरे देश में जहां सुबह के वक्त कागजों से बने तिरंगे को लोग सीने से लगाये छाती चौड़ी करके सभा समारोहों में बड़ी बड़ी बातें करते दिखते हैं,  शाम होते होते वही कागज के झण्डे जमीनों पर पाये जाते हैं। लोग देखते हुए भी अनजान बने उन पर पैर रखते खांचते चले जाते हैं। इसके उलट यहीं लखनऊ में मैंने कुछ ऐसे लोगों को भी देखा है जो 15 अगस्त या 26 जनवरी की शाम हाथ में प्लास्टिक का थैला लिये जगह जगह पड़े कागज के तिरंगों को बटोरते चलते हैं ताकि देश की शान को लोगों के पैरों के नीचे जाने से बचाया जा सके, लेकिन यह बात और कि इस किस्म की कवायद कम ही दिखाई देती है।


          एक और उदाहरण है- जितने श्रद्धा-विश्वास से लोग गंगा को नमन करते हुए हरिद्वार.वाराणसी आदि के घाटों पर गंगा पूजा करते हैं,  आरती उतारते हैं,  गंगा नहाते हैं,  पता चला गंगा सबसे ज्यादा प्रदूषित भी वहीं होती है। अधजले शव,  मृत पशु,  सूखे फूलों के ढेर आदि  मिलकर गंगा को बाकी क्षेत्रों के मुकाबले यहां ज्यादा ही प्रदूषित करते हैं।  एक घटना का उल्लेख ‘‘काशी का अस्सी’’ में है जिसमें गंगा को प्रदूषण मुक्त करने हेतु गंगा किनारे विद्वजनों की ओर से एक कार्यक्रम का आयोजन होता है। खूब धुआंधार, लच्छेदार भाषण होता है,  खूब बड़ी बड़ी बातें होती हैं (एकदम ओबामा टाइप) कि गंगा को बचाना चाहिये,  गंगा को प्रदूषण मुक्त करना चाहिये। ये होना चाहिये,  वो होना चाहिये लेकिन कार्यक्रम के खत्म होने के बाद लोग समोसा खाकर, चाय पीकर,  मिनरल वाटर की बोतलें खाली कर लम्बी डाकर लेते हैं और चलते बनते हैं पीछे छोड़ जाते हैं पत्तलों के ढेर,  प्लास्टिक की बोतलें,  थैलियां और प्लेटें । जाहिर सी बात है ये सब जाकर वहीं गंगा जी में ही समाहित होंगा आखिर चिंतन भी तो इन सबों  के बारे में हुआ था। 
     मुझे कुछ-कुछ वही हालात हिन्दी के लगते है। इस दिन हिन्दी को लेकर भी खूब बढ़-चढ़कर कहा जाता है। लोग जगह जगह हिन्दी की पुड़िया बांटते मिलते हैं कि हमें हिन्दी सेवा करनी चाहिये, हमें हिन्दी में काम करना चाहिये। हिन्दी बढ़ेगी तो देश बढ़ेगा। ये अलग बात है कि कार्यक्रम के समापन पर हाथ मिलाते हुए . नाइस टू मीट यू और थैक्स कहना नहीं भूलते।
       खैर बड़े बड़े हिन्दी सेवी देखे हैं जो अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम में पढ़ाते हैं। मुझे खुद भी उसी परिपाटी को जारी रखना है तो किस मुंह से उनकी निंदा करूं। हम अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम में नहीं पढ़ाना चाहते क्योंकि वास्तविकता जानते हैं। मैं खुद हिन्दी माध्यम से पढ़ा हूं लेकिन तब की और अब की परिस्थितियों में जमीन आसमान का फर्क है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। फिर क्या हिन्दी का कोई उज्जवल भविष्य नहीं है? या हिन्दी एकदम से गई गुजरी हो चुकी है लाचार सर्वहारा टाइप की?
नहीं न,  हिन्दी का भविष्य जरूर है,  किंतु आम लोगों के बोलचाल में ही,  या बहुत हुआ तो विज्ञापन में,  फिल्मों आदि में हिन्दी अभी खूब बढ़ेगी। सच मायनों में हिन्दी के प्रचार प्रसार में आमजनों का ही योगदान ज्यादा है न कि ‘हिन्दी डे’ के नाम पर फण्ड उगाही करने वाले गाल बजाऊ शुभ.चिन्तकों के दम पर।
     वहीं कुछ ऐसे हिन्दी के ठेकेदार है जो जबरिया क्लिष्ट हिन्दी की ठकर-ठकर लगाये रहते हैं कि हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों का आना ठीक नहीं,  इससे हिन्दी का नुकसान होता है,  पवित्रता नष्ट होती है। जबकि सच्चाई यह है कि ऐसे लोगों के क्लिष्टता प्रेम से ही हिन्दी के प्रचार प्रसार पर लगाम सी लग जाती है। ऐसे लोग क्लिष्टता की चादर ओढ़ समझते हैं कि बहुत विशिष्ट लग रहे हैं जबकि यही चादर उन्हें आमजन से दूरी बनाने हेतु मजबूर करती है। जहां लोग सामान्य बोलचाल में अपना काम कर ले जा रहे हैं वहां भला वे "खाता आहरण"  आदि भयंकर शब्दों को क्यों तवज्जों दें। वह सीधे अंग्रेजी को सहज पाकर उसकी ओर आकर्षित हो लेते हैं।
      जहां तक इंटरनेट पर हिन्दी के प्रसार प्रचार की बात है तो वह लोगों के शौक के वजह से बढ़ रही है न कि किसी हिन्दी सेवी के प्रवचनादि के बूते पर। लोग शौक से अपने लेख ब्लॉग पर लिख रहे हैं,  कविता लिख रहे हैं,  व्यंग्य लिख रहे है, और उसे हिन्दी जैसे सरल भाषा के माध्यम से पेश कर रहे हैं। जहां तक मैं समझता हूं हिन्दी इसी तरह बढ़ेगी,  पनपेगी,  फूलेगी,  फलेगी बिना किसी सरकारी सहायता के जैसे कि अब तक फलती फूलती आई है। उसे किसी सरकारी क्लिष्टता से जितना दूर रखा जाय उतना अच्छा रहेगा। हां,  इतना जरूर है कि 14 सितम्बर का दिन हिन्दी दिवस के रूप में मनाने से एक प्रकार की खुशफहमी जरूर मिलती है। लोग थोड़ा सा मिठाई-सिठाई खा लेते हैं। एकाध गर्दनों में फूल मालाएं सुशोभित हो जाती है। फूलों के गुलदस्ते लिये-दिये जाते हैं,  फोटू-सोटू खिंच जाता है,  ताली-आली बज जाती है, बस और क्या चाहिये हिन्दी को।

वैसे ये व्यापक शोध का विषय है कि खाली शोशेबाजियों से हिन्दी का कितना भला हो पाएगा।
अंत में पेश है कमलेश दिवेद्वी के चंद पंक्तियां:-
"हिन्दी पखवारा लगा हिन्दी आई याद, हिन्दी ब्राह्मण खा गए फिर हिन्दी का श्राद्ध" 

चलते-चलते :  मेरे अनुसार हिन्दी दिवस का एकमात्र उद्देश्य ये होता है की साल भर से डब्बो में धूल फांक रही हिन्दी को झाड-पोंछ कर बाहर निकाला जाए और पाश्चात्य संस्कृति की ‘‘वेलेंटाइन डे’’ की तरह एक विशेष दिन प्रदान कर इसके प्रति प्रेम प्रदर्शित किया जाए और फिर साल भर के लिए इसे उन्ही डब्बों में घुसेड़ दिया जाए ! इससे कुछ हो न हो अपराधबोध जरूर कम हो जाता है !
(झोलाछाप लेखक एंव हिन्दी चिंतक चिंटू )

Thursday, September 8, 2011

मौतों का तमाशा आखिर कब तक?



देश की राजधानी दिल्ली, समूचे भारत को खुद में समेट दिनभर भागती-दौड़ती दिल्ली, समय के साथ हर रोज फैलने वाली दिल्ली को आखिरकार आज एक बार फिर से इंसानियत के दुश्मनों की नजर लग ही गयी। कल सुबह दिल्ली हाईकोर्ट में भीषण बम विस्फोट कर आंतकियों ने आंतक के किताब में एक और कामयाबी दर्ज करा ली थी। और  हर बार की तरह इस बार भी हमारी सरकार ने भी बेगुनाहों की जान की कीमत पर शातिर मुआवजे का मरहम लगाकर अपने कर्तव्यों से इतिश्री करने की जमीन तैयार करने की कवायद शुरू कर दी है। कई घरों के चिराग बेवक्त हमेशा के लिये बुझ गए। सरकार ने मरहम के तौर पर मुआवजे की घोषणा करके मौतों की कीमत लगा दी। कुछ इस तरह कि ‘हम सबक नहीं लेंगे। गलती तो हुई है, लेकिन कीमत भी तो दे रहे हैं।’ जिनके घरों के चिराग बुझ गए उनके दर्द की दवा पैसा नहीं है। जांच की बात भी हो गई। जाहिर है जांच, मुआवजा और राजनीति का जमकर तमाशा होने वाला है। जांच के नतीजे रसूखदारों के इशारों पर नाचकर हमेशा की तरह फाइलों में दफन हो जायेंगे।


लाचार कानून तंत्र के आगे एक बार फिर इंसाफ की आवाज हांफकर दम तोड़ देगी। दिल्ली में आज सुबह सब कुछ पहले जैसा दिखा। बच्चे स्कूल जा रहे थे, लोग ऑफिसों के लिए भाग रहे थे, कामगार हाथ में टिफिन लिए अपने काम पर जा रहे थे। बसें, कारें मोटरसाइकिलें सब कुछ पहले जैसे चल रहे थे वैसे ही आज भी चल रहे हैं। दिल्ली ने अब तक इतना दर्द झेल लिया है कि बम फटने जैसी घटना से उसने तिलमिलाना लगभग छोड़ ही दिया है। अब तो कहीं कोई घटना होती है तो दिल्ली यूं बर्ताव करती है जैसे कुछ हुआ ही नहीं। बस कुछ समय के ठहरती है और फिर कहती है- ‘चल यार ये तो रोज का है।’
कुछ लोग दिल्ली के इस व्यवहार को दिल्लीवासियों के जज्बे से जोडने लगते हैं तो कुछ इसे मजबूरी का नाम देते हैं और कहते हैं कि आखिर करें क्या?। बात काफी हद तक सच है। बच्चों को स्कूल , लोगों को द तर और कामगारों को काम पर न चाहते हुए भी जाना ही पड़ेगा। न न करते हुए भी आज की बजाए कल को लेकर चलना पड़ता है। अब इसे कोई दिल्ली वालों का जज्बा कहे तो यह उनका मुगालता है, लेकिन सच्च्चाई यही है कि लोग कुछ मजबूरी और कुछ पनप रही बेपरवाह फितरत के चलते रोजमर्रा के ढर्रे में ढल गए हैं और ऐसे हादसों के बावजूद चले जाते हैं, चले जाते हैं। ये दिल्ली वासियों का जज्बा उनके लिए है जिनके पास फालतू समय है बोलने बतियाने के लिए। असली दिल्लीवासी तो फोन पर लगा होगा- हां आ रहा हूं .....इधर टै्रफिक बहुत जाम है, यार थोड़ा टाइम लगेगा रास्ते में फंसा हूं, हां दूध लेता आऊंगा और न जाने कितनी उलझनों को सुलझाता हुआ दौड़ता जा रहा होगा। वैसे इन तमाम तर्कों से दिल्ली भले ही मुसीबतें झेलने के लिए अभिशप्त दिखे लेकिन इन्हीं बार-बार खड़ी होने वाली मुसीबतों ने दिल्ली की रगों में ऐसी प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर दी है कि वह इन हादसों को ‘पार्ट ऑफ लाइफ’  ट्रीट करने लगी है।


वैसे तमाम राजनीतिक दल और उनके स्वयंभू राजनेता, स्वयंसेवी संस्थाएं, मीडिया आदि सुरक्षा को सवाल जरूर उठायेंगे और उठा भी रहे हैं लेकिन अब लोग जाने चुके हैं कि बाकी चीजों कि तरह यह भी एक रोजमर्रा की होने वाली कांय-कांय है, इससे ज्यादा कुछ नहीं । लोग भुनभु्रनाएंगे, झल्लाएंगे, मोमबत्तियां जलाएंगे और बाकी की सारी रस्में निभाएंगे...वैसे ही जैसे अब तक करते आ रहे हैं इस तरह के हादसों के बाद।
ऐसे में सवाल अभी भी वहीं जिंदा है कि आखिर कब तक ये इंसानियत का नंगा नाच चलता रहेगा, कब तक यूं ही बेगुनाह अपनी जाने गंवाते रहेंगे, कब तक शोशेबाजीयां झेलते रहेंगे। शायद इसका जवाब किसी के पास नहीं है, न कल तक था, न आज है और न आगे कभी होने की संभावना प्रतीत होती है। किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि ‘आखिर कब तक’?


Monday, September 5, 2011

मेरी सम्पत्ति घोषणा, अब कोई डाऊट मत रखना


 देश में भ्रष्टाचार के प्रति पनपते आक्रोश को देखते हुए मैं काफी सहम सा गया हूं। दिनभर लोगों को भ्रष्ट बोलते-बोलते अब मुझे डर सा लगने लगा है। न जाने क्यूं अब रोज रात सपने में स्वप्नसुदंरी की जगह घर के बाहर दरवाजे पर टंगी पत्रपेटी आती है। लगता है कि केजरीवाल और किरन बेदी के बाद अब मुझे भी कोई नोटिस मिलने वाली है। जिस तरह से सभी माननीय पारदर्शिता दर्शाने के लिए अपनी-अपनी सम्पतियां घोषित कर खुद को लकीर का फकीर साबित कर रहे हैं, जजों को महाभियोग काल से गुजरना पड़ रहा है। उससे प्रतीत होता है कि अब सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ ज्यादा बक-बक करने वालों के पोस्टमार्टम की तैयारी कर रही है। मेरी भलाई इसी में है कि मैं समय रहते अपनी सम्पत्ति की घोषणा कर दूं। अपना दिल थाम लें, बेहतर होगा। सम्पत्ति के नाम पर मेरे पास "दस बाई दस" के दो कमरों की आलीशान (जर्जर आपके लिए होगी) कोठी है जोकि प्राकृतिक साजो-सामान से लैस है। बारिश के मौसम में नहाने के लिए बाथरूम तक जाने की जहमत नहीं उठानी पड़ती कमरे में ही स्नानादि किया जा सकता है। छत पर पड़ी दरारें फौव्वारे का काम करती हैं। वाहन के नाम पर मेरे पास एक "मंगल पाण्डेय" टाइप साइकिल है। जिसमें ब्रेक का बवाल ही नहीं है। जिसे देखकर दूध वाला भी मुझे कभी-कभी उसे म्यूजियम में रखने की सलाह दे डालता है। जिस बाइक में मैं कभी-कभी दिख जाता हूं असल में वो बगल वाले शर्मा जी की है जिसका उपयोग मैं उनकी गैरमौजूदगी में उनके सुपुत्र को चुटकुले सुनाकर कर लेता हूं। उसका मन बहल जाता है और मेरा भौकाल टाइट हो जाता है। हीरे जवाहरात के नाम पर मेरे पास पुरी से दो-दो रुपये में लाए हुए पचास मोती हैं जिन्हें मैंने सुरक्षा के लिहाज से घर के पिछवाडे़ जमीन खोदकर छिपा रखा है। सुना है सोना 28 हजारी हो चला है लेकिन उस सोने से मेरा दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। सोने के नाम पर मैं सिर्फ बिस्तर पर ही सोना जानता हूं। कैश के नाम पर सुबह दूध और सब्जी लाने के बाद मेरे पास 229 रुपये बचे हैं और अभी महीना खत्म होने में 20 दिन बाकी हैं। जेब में "एटीएम टाइप" के तीन-तीन यंत्र हैं। दो पड़े पाए थे एक बैंक ने दिया था, लेकिन उनका इस्तेमाल खतरे से खाली नहीं है। कारण बैंक में एकाउण्ट मिनिमम बैलेंस 1000 रुपये से खुलवाया था और उसे सात सालों बाद भी वैसे ही मेनटेन कर रखा है। बैंक वाले कई बारगी मेरी तलाश में घर आ चुके हैं। मां से कहकर गए हैं हमने बैंक खोला रखा है कोई सेक्योरिटी एंजेसी नहीं। मेरे पास दफ्तर की तरफ से दिया हुआ एक टूटा पुराना "मोबाइल" भी है जिसमें सिर्फ इनकमिंग की सुविधा है, आउटगोंइग पिछले कई सालों से बंद है। रिचार्ज के पैसे बचाकर मैं दिन में दो बार चाय जो पी लेता हूं। पिता जी की दी हुई एक एचएमटी ब्राण्ड की "कलाई घड़ी" भी है जो दिनभर में तीन बार चाभी भरने पर आधा घंटा पीछे का टाइम बताती है। किन्तु मैं हालातों के साथ समझौता कर उससे सही समय समझ लेता हूं। कपड़ों के नाम पर मेरे पास नुक्कड़ वाले खान चचा द्वारा डिजाइन किए हुए तीन जोड़ी पैन्ट और शर्ट हैं। उसके आलावा जो पहने दिख जाता हूं वह सब दोस्तों और रिश्तेदारों का प्यार है। या यूं कह लें कि वो मुझे रोज-रोज एक ही पैन्ट में देखकर बोर हो जाए है तो वह मुझे अपने रंगीन कपड़े एकाध रोज के लिए उधार दे देते हैं। जिन्हें पहनकर मैं अक्सर रौब गांठता दिख जाता हूं। मेरे पास एक अकबर के जमाने का पोर्टेबुल साइज का "रंगीन टीवी" भी है जिसके रंगीन होने का रहस्य आजतक मेरे और उसके अलावा कोई नहीं जान सका। उसकी हालत ऐसी है कि उसके साथ मेरी फोटो अगर अखबार में छप जाए तो तुसाद म्यूजियम वाले अपने म्यूजियम में मेरा मोम का पुतला लगाने के खातिर मुझे ढूंढ़ने के लिए मेरे पीछे खुफिया एंजेसियां लगा देंगे। एक फ्रिज भी है जिसके बारे में मां को कई बार कहते हुए सुना है कि मेरे जन्म के लगभग एक साल पहले तक उसमें बर्फ जमा करती थी। इस समय उसका इस्तेमाल मैं अपने जूते-मोजे सहित कई घरेलू सामानों को रखने में करता हूं। फिलहाल इतना ही काफी है। बाकी मैं चिदम्बरम्, मुखर्जी, सिब्बल और दिग्विजय सिंह की तरह चिंदी नहीं हूं जो मग्घे, बाल्टी और लोटे तक की घोषणा करता फिरूं।


(झोलाछाप लेखक )
चिन्टू