आज ‘हिन्दी डे’ था । हां बाबू वही ‘हिन्दी डे’ जब हम अचानक साल भर अग्रेंजी के स्विमिंग पूल में तैरने के बाद हिन्दी की पोखरी में गोता लगाने उतरते हैं फिर हिन्दी को अपनी राष्ट्र भाषा बता इसकी दुर्दशा पर आंसू भी बहाते हैं, इसके उत्थान के लिए कसमें खाते हैं, मगर ‘हिन्दी डे’ ही मनाते हैं (वो क्या है न हिन्दी दिवस कहने में शर्म आती है)। हिन्दी विभागों में तो इस दिन को पर्व के रूप में मनाया जाता है (मतलब दिखावे की सारी पराकाष्ठा पार)। ये अलग बात है कि रागदरबारी के रचियता श्रीलाल शुक्ल जी ने इसे हिन्दी दिवस न मानकर एक प्रकार का पाखण्ड पर्व कहा जिससे मैं एक हद तक सहमत भी हूँ। मैं ही क्या बहुतों की सहमति होगी। मुझे तो अब इस बात का डर सताने लगा है कि कहीं भविष्य में हिन्दी के अस्तित्व के लिए हिन्दी महीना न मनाना पड़े। जो लोग हिन्दी के नाम पर संस्कृति या भाषा प्रचारक बनते हैं उनकी जरूर ऐसे समय में निकल पड़ती है (फण्ड आदि की थोड़ी सुविधा जो मिल जाती है)। आज कष्ट इस बात का हुआ कि मेरे सभी यार, दोस्त और दफ्तर में साथ काम करने वाले सभी सहकर्मी जो मामूली से मामूली ‘डे’ की शुभकामनाएं देते नहीं थकते थे। फालतू टाइप के मैसेज भेजकर पूरे इन्बाक्स पर अपना अधिपत्य जमा लेते थे (मानो मोबाइल मैं उन्हीं के बेकार मैसेजों को अपने पास सुरक्षित रखने के लिए लिया हो)। हिन्दी दिवस पर उन्हीं सूरमाओं से अपनी राष्ट्रभाषा (हिन्दी) के सम्मान के लिए उनके मोबाइल बैलेस से 10 पैसे नहीं खर्च किए जा सके (जियो जवानों जम्हूरियत तुम्हारे बल पर ही जिंदा है)।
खैर यह भी देखा गया है कि जिस किसी के नाम पर उसका ‘डे’ मनाया जाता है उसी दिन उसकी ज्यादा से ज्यादा अवमानना भी होती है। पंद्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी के दिन पूरे देश में जहां सुबह के वक्त कागजों से बने तिरंगे को लोग सीने से लगाये छाती चौड़ी करके सभा समारोहों में बड़ी बड़ी बातें करते दिखते हैं, शाम होते होते वही कागज के झण्डे जमीनों पर पाये जाते हैं। लोग देखते हुए भी अनजान बने उन पर पैर रखते खांचते चले जाते हैं। इसके उलट यहीं लखनऊ में मैंने कुछ ऐसे लोगों को भी देखा है जो 15 अगस्त या 26 जनवरी की शाम हाथ में प्लास्टिक का थैला लिये जगह जगह पड़े कागज के तिरंगों को बटोरते चलते हैं ताकि देश की शान को लोगों के पैरों के नीचे जाने से बचाया जा सके, लेकिन यह बात और कि इस किस्म की कवायद कम ही दिखाई देती है।

एक और उदाहरण है- जितने श्रद्धा-विश्वास से लोग गंगा को नमन करते हुए हरिद्वार.वाराणसी आदि के घाटों पर गंगा पूजा करते हैं, आरती उतारते हैं, गंगा नहाते हैं, पता चला गंगा सबसे ज्यादा प्रदूषित भी वहीं होती है। अधजले शव, मृत पशु, सूखे फूलों के ढेर आदि मिलकर गंगा को बाकी क्षेत्रों के मुकाबले यहां ज्यादा ही प्रदूषित करते हैं। एक घटना का उल्लेख ‘‘काशी का अस्सी’’ में है जिसमें गंगा को प्रदूषण मुक्त करने हेतु गंगा किनारे विद्वजनों की ओर से एक कार्यक्रम का आयोजन होता है। खूब धुआंधार, लच्छेदार भाषण होता है, खूब बड़ी बड़ी बातें होती हैं (एकदम ओबामा टाइप) कि गंगा को बचाना चाहिये, गंगा को प्रदूषण मुक्त करना चाहिये। ये होना चाहिये, वो होना चाहिये लेकिन कार्यक्रम के खत्म होने के बाद लोग समोसा खाकर, चाय पीकर, मिनरल वाटर की बोतलें खाली कर लम्बी डाकर लेते हैं और चलते बनते हैं पीछे छोड़ जाते हैं पत्तलों के ढेर, प्लास्टिक की बोतलें, थैलियां और प्लेटें । जाहिर सी बात है ये सब जाकर वहीं गंगा जी में ही समाहित होंगा आखिर चिंतन भी तो इन सबों के बारे में हुआ था।
मुझे कुछ-कुछ वही हालात हिन्दी के लगते है। इस दिन हिन्दी को लेकर भी खूब बढ़-चढ़कर कहा जाता है। लोग जगह जगह हिन्दी की पुड़िया बांटते मिलते हैं कि हमें हिन्दी सेवा करनी चाहिये, हमें हिन्दी में काम करना चाहिये। हिन्दी बढ़ेगी तो देश बढ़ेगा। ये अलग बात है कि कार्यक्रम के समापन पर हाथ मिलाते हुए . नाइस टू मीट यू और थैक्स कहना नहीं भूलते।
खैर बड़े बड़े हिन्दी सेवी देखे हैं जो अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम में पढ़ाते हैं। मुझे खुद भी उसी परिपाटी को जारी रखना है तो किस मुंह से उनकी निंदा करूं। हम अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम में नहीं पढ़ाना चाहते क्योंकि वास्तविकता जानते हैं। मैं खुद हिन्दी माध्यम से पढ़ा हूं लेकिन तब की और अब की परिस्थितियों में जमीन आसमान का फर्क है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। फिर क्या हिन्दी का कोई उज्जवल भविष्य नहीं है? या हिन्दी एकदम से गई गुजरी हो चुकी है लाचार सर्वहारा टाइप की?
नहीं न, हिन्दी का भविष्य जरूर है, किंतु आम लोगों के बोलचाल में ही, या बहुत हुआ तो विज्ञापन में, फिल्मों आदि में हिन्दी अभी खूब बढ़ेगी। सच मायनों में हिन्दी के प्रचार प्रसार में आमजनों का ही योगदान ज्यादा है न कि ‘हिन्दी डे’ के नाम पर फण्ड उगाही करने वाले गाल बजाऊ शुभ.चिन्तकों के दम पर।
वहीं कुछ ऐसे हिन्दी के ठेकेदार है जो जबरिया क्लिष्ट हिन्दी की ठकर-ठकर लगाये रहते हैं कि हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों का आना ठीक नहीं, इससे हिन्दी का नुकसान होता है, पवित्रता नष्ट होती है। जबकि सच्चाई यह है कि ऐसे लोगों के क्लिष्टता प्रेम से ही हिन्दी के प्रचार प्रसार पर लगाम सी लग जाती है। ऐसे लोग क्लिष्टता की चादर ओढ़ समझते हैं कि बहुत विशिष्ट लग रहे हैं जबकि यही चादर उन्हें आमजन से दूरी बनाने हेतु मजबूर करती है। जहां लोग सामान्य बोलचाल में अपना काम कर ले जा रहे हैं वहां भला वे "खाता आहरण" आदि भयंकर शब्दों को क्यों तवज्जों दें। वह सीधे अंग्रेजी को सहज पाकर उसकी ओर आकर्षित हो लेते हैं।
जहां तक इंटरनेट पर हिन्दी के प्रसार प्रचार की बात है तो वह लोगों के शौक के वजह से बढ़ रही है न कि किसी हिन्दी सेवी के प्रवचनादि के बूते पर। लोग शौक से अपने लेख ब्लॉग पर लिख रहे हैं, कविता लिख रहे हैं, व्यंग्य लिख रहे है, और उसे हिन्दी जैसे सरल भाषा के माध्यम से पेश कर रहे हैं। जहां तक मैं समझता हूं हिन्दी इसी तरह बढ़ेगी, पनपेगी, फूलेगी, फलेगी बिना किसी सरकारी सहायता के जैसे कि अब तक फलती फूलती आई है। उसे किसी सरकारी क्लिष्टता से जितना दूर रखा जाय उतना अच्छा रहेगा। हां, इतना जरूर है कि 14 सितम्बर का दिन हिन्दी दिवस के रूप में मनाने से एक प्रकार की खुशफहमी जरूर मिलती है। लोग थोड़ा सा मिठाई-सिठाई खा लेते हैं। एकाध गर्दनों में फूल मालाएं सुशोभित हो जाती है। फूलों के गुलदस्ते लिये-दिये जाते हैं, फोटू-सोटू खिंच जाता है, ताली-आली बज जाती है, बस और क्या चाहिये हिन्दी को।
वैसे ये व्यापक शोध का विषय है कि खाली शोशेबाजियों से हिन्दी का कितना भला हो पाएगा।
अंत में पेश है कमलेश दिवेद्वी के चंद पंक्तियां:-
"हिन्दी पखवारा लगा हिन्दी आई याद, हिन्दी ब्राह्मण खा गए फिर हिन्दी का श्राद्ध"
चलते-चलते : मेरे अनुसार हिन्दी दिवस का एकमात्र उद्देश्य ये होता है की साल भर से डब्बो में धूल फांक रही हिन्दी को झाड-पोंछ कर बाहर निकाला जाए और पाश्चात्य संस्कृति की ‘‘वेलेंटाइन डे’’ की तरह एक विशेष दिन प्रदान कर इसके प्रति प्रेम प्रदर्शित किया जाए और फिर साल भर के लिए इसे उन्ही डब्बों में घुसेड़ दिया जाए ! इससे कुछ हो न हो अपराधबोध जरूर कम हो जाता है !
(झोलाछाप लेखक एंव हिन्दी चिंतक चिंटू )